52 गांव के देवता ‘मंगरहा बाबा’ को पूजने आता है पूरा बनारस

52 गांव के देवता ‘मंगरहा बाबा’ को पूजने आता है पूरा बनारस

वाराणसी। सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार ग्राम देवता को पूजने का प्रावधान है। किसी भी पूजा में जिस प्रकार गणेश भगवान से पूजा की शुरआत की जाती है उसी प्रकार उस स्थान या ग्राम के देवता के रूप में डीह को भी पूजा जाता है। आमतौर पर डीह, गांव के देवता को कहा जाता है और ऐसा माना जाता है कि डीह पूरे गांव की रक्षा करते हैं और उनके सुख दुख में सहभागी भी होते हैं। यही नहीं मान्यता ये भी है कि उनसे मांगी गई मनोकामना भी वो पूरी करते हैं। ऐसे ही सारनाथ के सलारपुर गांव में स्थित है मंगरहा बाबा का मंदिर जिनका पूरे 52 गांव के डीह के तौर पर मान्यता है।

दर्शन मात्र से होती हैं सबकी मनोकामना पूर्ण, 52 गांव का रखते हैं ख्याल

मंगरहा बाबा कौन थे कहाँ से आये ये बता पाना काफी मुश्किल है। कहा जाता है कि 200 साल पहले से इनका यहां छोटा सा मंदिर था जो अब धीरे धीरे वृहद आकार ले चुका है। 52 गांव के बड़े इलाके का डीह होने से यहां दूर दूर से श्रद्धालु दर्शन को आते हैं। यहां मांगी हुई हरेक मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। बाबा को सभी प्रकार की मिठाइयां विशेष कर बेसन के लड्डू, फल फूल, भांग, शराब आदि चढ़ता है। बाबा के यहां बलि देने का भी प्रावधान है। मंगरहा बाबा के यहां मुंडन संस्कार और विवाह आदि भी होता है। बाबा का दर्शन प्रत्येक दिन होता है लेकिन मान्यता है कि रविवार व मंगलवार को दर्शन से विशेष फल की प्राप्ति होती है।

 

चैत्र व शारदीय नवरात्र में लगता है मेला

मंदिर के पुजारी पुन्नी महाराज ने बताया कि उनके पिता स्व फुल्लू महाराज ने मंदिर की स्थापना कराई थी। वरुणा नदी मंदिर से टकराकर गंगा की ओर मुड़ती हैं। मंगरहा बाबा की आरती प्रतिदिन सुबह शाम की जाती है। सुबह की आरती पुजारी रामदरस और शाम की आरती पुजारी पुन्नी महाराज करते हैं। जिनकी मनोकामना पूर्ण होती है वो बाबा के मंदिर में विशेष दान करते हैं। भक्तों की मदद से ही मंदिर भव्य होता जा रहा है। यहां कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को दंगल होता है जिसमें काफी भीड़ उमड़ती है। इसके अलावा चैत्र व शारदीय नवरात्र को यहां मेले जैसा माहौल रहता है।मंदिर प्रांगण में अन्य देवी देवताओं के मंदिर, हनुमान जी का मंदिर व मंदिर के संस्थापक स्व फुल्लू महाराज की समाधि भी है।

रिपोर्ट : दिनेश मिश्र