इसलिए मोदी जी ने अपना अनमोल दोस्त खोया है- पदमपति शर्मा

इसलिए मोदी जी ने अपना अनमोल दोस्त खोया है

पदमपति शर्मा की कलम से।
भाजपा और विशेष तौर पर नरेन्द्र मोदी जी को एक के बाद एक लगातार दिग्गज सहयोगियों की मौत के झटके लग रहे हैं. गत वर्ष 16 अगस्त को अटल जी के प्रयाण के बाद से यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा. आम आदमी की सादगी को अपने जीवन मे रचा बसा लेने वाले मनोहर परिर्कर गये तो अनंत कुमार भी अनंत मे विलीन हो गये. पांच अगस्त को महान सुषमा जी की चिरनिद्रा मे चले जाने के सदमे से अभी देश उबरा भी नहीं था कि हरदिल अजीज अरुण जेतली जी भी 24 अगस्त को दुनिया छोड़ बैठे. तीन देशों की यात्रा कर रहे शोकमग्न प्रधानमंत्री मोदी जी ने जब कहा कि उन्होंने जेतली जी के रूप मे अपना अनमोल दोस्त खो दिया है तो विश्वास कीजिए कि यह उनके विदीर्ण ह्रदय से निकली एक कातर आवाज थी.

जेतली जी के परिवार के आग्रह पर मोदी जी अपनी विदेश यात्रा जारी रखें हुए हैं. लेकिन जिसने भी भाजपा की राजनीति को करीब से देखा है वह जानता है कि क्यों नरेन्द्र मोदी भाई ने एक बेशकीमती रत्न खोया है.जेतली जी की उदारता-दानशीलता, उनकी चाणक्य की भूमिका, विपक्ष की आलोचनाओं की धार अकाट्य तर्को के साथ कुन्द करने मे उनकी महारत, समय समय पर संकटमोचक के तौर पर असंख्य बार उभरने और भारतीय क्रिकेट के उन्नायक के साथ ही उनकी अर्थनीति की प्रचंड विद्वता पर बहुत कुछ कहा-लिखा जा चुका है.

मुझे तो उन बातों और घटनाओं के बारे चर्चा करनी है कि मोदी जी ने उन्हें अपना विश्वस्त साथी क्यों बताया ? मै जब यह कहता हूँ कि मोदी जी यदि आज प्रधानमंत्री हैं तो इसका सबसे बड़ा श्रेय किसी को है तो वह कानून के महापंडित रहे अरुण जेतली ही हैं. अन्यथा तो मोदी जी 2002 मे ही गुजरात के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर राजनीति के अंधेरे मे कहीं गुम हो चुके होते.

“मुख्यमंत्री जी आप राजधर्म का पालन करें”- सन 2002 मे गुजरात दंगों को लेकर अहमदाबाद मे तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की ये बहुचर्चित पंक्तियाँ सभी को आज भी याद हैं. उनके इस बयान के पश्चात मोदी जी के राजनीतिक गुरू लालकृष्ण आडवाणी जी ने स्पष्ट शब्दों मे अपने शिष्य को त्यागपत्र देने का फरमान जारी कर दिया था. वहां मौजूद जेतली जी और प्रमोद महाजन ( स्मृति शेष ) को लगा कि यह तो अनर्थ होने जा रहा है, एक निरपराध बलि चढ़ने जा रहा है.

उक्त दोनो ने अटल जी के साथ ही अहमदाबाद से विमान मे गोवा तक का सफर किया और रास्ते मे पीएम महोदय को वस्तुस्थिति से परिचित कराते हुए बताया कि जो प्रोपेगंडा मोदी जी के लिए चलाया जा रहा है वह एकदम गलत है. मुख्यमंत्री ने 48 घंटों मे ही सेना बुला ली थी और जिसे नरसंहार बताया जा रहा है वह असल मे दंगा है, जिसमें यदि साढ़े आठ सौ के आसपास मुसलमान मारे गए हैं तो हिन्दू भी ढाई सौ के आसपास मरे हैं, जिनमें कई पुलिस की गोली के शिकार हुए हैं.

अटल जी को बात समझ मे आ गयी. अगल ही दिन गोवा मे भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक मे उनके सुर बदल गये और मोदी जी को जीवनदान मिल गया.

देश ने देखा होगा कि 2013 मे भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को लेकर आडवाणी जी किस कदर कुपित हुए और बगावत सी कर दी थी उन्होंने. पिछले दो लोकसभा चुनाव मे इस पद के बतौर दावेदार मुंहकी खा चुके आडवाणी जी का प्रबल विरोध निष्फल सिद्ध हुआ. क्योंकि 2012 से ही इस अभियान मे लगे जेतली जी ने अंततः आडवाणी के समर्थक समझे जाने वाले पार्टी के वरिष्ठ दिग्गजों को मोदी जी के पक्ष मे लामबंद करने मे सफलता जो प्राप्त कर ली थी.

हो सकता है कि भाजपाइयो मे कितनो को ही मेरी बात बुरी लगे. मुझे इसकी कतई परवाह नहीं. यह सच है कि एक घटना ने जेतली की आडवाणी जी के प्रति धारणा बदल दी थी. बात शायद 2010 या 2011 की है. अरुण जेतली को पता चला कि श्रीमती सोनिया गाँधी के दामाद राबर्ट वाड्रा ने हरियाणा और राजस्थान मे कांग्रेस सरकार की मिलीभगत से किसानों की जमीने औने पौने दाम में खरीद कर फिर उनको करोड़ों मे बेचने का धतकरम किया है. वह संसद भवन के कक्ष मे बैठे आडवाणी जी के पास गए और वाड्रा के घोटालों के बारे मे बताया. बताया जाता है कि उनके पास उस समय मुरली मनोहर जोशी, जसवंत सिंह ( कोमाग्रस्त ) , यशवन्त सिन्हा आदि मौजूद थे. आडवाणी जी ने सारी बात सुनने के बाद कहा कि हम लोग राजनीति मे विरोध तो एक दूसरे का करते हैं मगर उनके बच्चों पर हाथ नहीं डालते.

जेतली यह सुन कर उदास हो गये. थोड़ी ही देर बाद जब वह संसद की कैन्टीन मे चाय पी रहे थे कि श्रीमती सोनिया गाँधी के तत्कालीन राजनीतिक सचिव अहमद पटेल ने जेतली के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ” क्यों जेतली भाई बच्चों के पीछे पड़े हो ?” इसके बाद पटेल ने वही सब दोहरा दिया जो उन्होंने थोड़ी देर पहले आडवाणी जी से कहा था. जेतली यह सुन कर सन्न रह गये और वह इसलिए भी सकते मे आ गए कि उनकी बात कांग्रेस आलाकमान तक कैसे पहुँचा दी गयी ?

देखिए मै यह सब बता कर आडवाणी जी की पार्टी के प्रति निष्ठा और उनकी ईमानदारी पर कतई संदेह नहीं कर रहा हूँ. लेकिन इस सच को भी स्वीकार करना होगा कि अटल जी रहे हों या आडवाणी जी अथवा उनके समकालीन राजनेता, ये नेहरू युगीन रहे हैं. इसके चलते कांग्रेसी आलाकमान के प्रति उनके साफ्ट कार्नर से इनकार नहीं किया जा सकता.

कांग्रेस का भी इन नेताओं के प्रति वैसा ही नजरिया रहा है और जब तब उनके दिए बयानों से यह झलका भी है. जेतली जी ने इसकी चर्चा मोदी जी से नहीं की होगी यह शायद ही कोई मानेगा. लेकिन शायद ही कोई इससे इनकार करेगा कि मोदी सरकार की कार्यशैली पुरानी घिसीपिटी लीक से अलग हट कर है जो विपक्ष और खासकर कांग्रेस को इसीलिए नहीं पच रही.

हम सभी ने 2014 से हमेशा आडवाणी जी को एक ही शोक सी मुद्रा मे देखा. शायद ही वह कभी मुस्कुराते नजर आए होंगे. भाजपा की मातृ राजनीतिक संस्था जनसंघ के प्रमुख संस्थापक आडवाणी जी राष्ट्रपति क्यों नहीं बन सके ? यह आज की तारीख मे कोई यक्ष प्रश्न नहीं है.

यदि कहा जाय कि मोदी जी के दिल्ली के गलियारो केे लिए राजनीतिक गुरू की भी भूमिका निभा चुके अरुण जेतली जी का जाना प्रधानमंत्री जी के लिए किसी वज्रपात से कम नहीं है तो यह कहीं से भी गलत नहीं. राजनीति और कूटनीति के इस दुर्घर्ष योद्धा के पंचतत्व मे विलीन होने पर इस नाचीज की अश्रुपूरित श्रद्धांजलि. आप बहुत याद आएँगे अरुण जी.

–पदमपति शर्मा