कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया को कांग्रेस ने एक बार फिर बनाया रतलाम-झाबुआ संसदीय सीट का उम्मीदवार, 1977 में कांतिलाल भूरिया ने की थी अपने राजनैतिक केरियर की शुरुवात –

कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया को कांग्रेस ने एक बार फिर बनाया रतलाम-झाबुआ संसदीय सीट का उम्मीदवार, 1977 में कांतिलाल भूरिया ने की थी अपने राजनैतिक केरियर की शुरुवात –

News@- हरीश राठौड़ –
पेटलावद (झाबुआ) – कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया को कांग्रेस एक बार फिर रतलाम झाबुआ संसदीय सीट से अपना उम्मीदवार बनाया। हालांकि ये हपले से ही तय था कि कांतिलाल भूरिया ही कांग्रेस को चेहरा होंगे। क्योंकि इस सीट पर उनके सामने दूसरा मुफीद चेहरा पार्टी के पास नहीं है। 42 साल के राजनैतिक अनुभव को दरकिनार करना आसान भी नहीं था।
कांतिलाल भूरिया और कांग्रेस।
कांतिलाल भूरिया साल 1977 में पहली बार विधानसभा चुनाव लडे थे। झाबुआ की थांदला विधानसभा सीट से उन्होंने अपने राजनीतिक केरियर की शुरूआत की थी। लेकिन भूरिया पहला चुनाव हार गए थे। इस समय तक जिले में मामा बालेश्वर दयाल का अच्छा प्रभाव था। साल 1980 में दूसरी बार थांदला विधानसभा सीट से चुनाव लडे और जीतकर म/यप्रदेश विधानसभा में पहुंचे।इसके बाद भूरिया ने पीछे मुड कर नहीं देखा। 1980 से 1993 तक भूरिया ने लगातार चार चुनाव जीते। 1993 में दिग्विजय सिंह सरकार में वे आदिम जाति मंत्री रहे। 1998 में कांतिलाल भूरिया ने लोकसभा का चुनाव लडा और जीत दर्ज की। इसके बाद उन्होंने 1999, 2004 और 2009 के चुनावमें जीत दर्ज कर लोकसभा में पहुंचे। साल 2013 में उन्हें म/यप्रदेश कांग्रेस का अ/यक्ष बनाया गया। साल 2014 के आम चुनावों में कांग्रेस ने एक बार फिर उन्हें 5 वीं बार रतलाम झाबुआ से अपना उम्मीदवार बनाया लेकिन इस बार कांतिलाल भूरिया मोदी लहर में ये सीट हार गए। उन्हें बीजेपी के दिलीप सिंह भूरिया ने शिकस्त दी। 2014 के चुनाव में मिली हार के बाद ज्यादा दिन तक कांतिलाल भूरिया देश की संसद से दूर नहीं रहे। 24 जून 2015 को बीजेपी सांसद दिलीपसिंह भूरिया के निधन के बाद नवंबर 2015 में एक बार फिर उपचुनाव हुए और कांतिलाल भूरिया 88 हजार वोटों से चुनाव जीत गए।
2019 के चुनावों में कांग्रेस ने एक बार फिर उन्हें अपना चेहरा बनाया है। कांतिलाल भूरिया लगातार रतलाम झाबुआ संसदीय सीट से ये 7 वां चुनाव लडेगें। 5 बार के सांसद रह चुके कांग्रेस नेता कांतिलाल भूरिया के 42 साल की राजनीति में केवल 2 चुनावों में हार मिली।
परिवारवाद का आरोप।
हाल ही में हुए म/यप्रदेश के विधानसभा चुनावों में टिकट वितरण को लेकर कांतिलाल भूरिया का पूरे संसदीय क्षेत्र में जमकर विरोध हुआ। कई जगह उनका विरोध हुआ। परिवारवाद का आरोप झेल रहे भूरिया के लिए इस चुनाव में सबसे बडा झटका तब लगा जब उनके बेटे विक्रांत भूरिया झाबुआ विधानसभा सीट से चुनाव हार गए। अपने बेटे की राजनीतिक लांचिंग के लिए भूरिया ने दिन रात एक कर दिया। कांग्रेस पार्टी के भीतर उपजे असंतोष ने विक्रांत को जीतने नहीं दिया। टिकट नहीं मिलने से नाराज कांग्रेस नेता जेवियर मेडा ने भूरिया कांग्रेस और असली कांग्रेस का नारा बुलंद करते हुए निर्दलीय चुनाव लडा।
कई धडे नाराज किंतु खुल कर नहीं आते सामने।
कांतिलाल भूरिया इस समय झाबुआ जिले में कांग्रेस का सबसे बडा चेहरा और सर्वमान्य है। इनके बराबर किसी भी नेता का कद नहीं है। कांग्रेस में कुछ धडे भूरिया जी से नाराज है किंतु खुल कर अपना विरोध नहीं कर पाते है। ऐसे ही कई धडे पेटलावद विधानसभा में भी है। जिन्होंने विधानसभा टिकट के लिए प्रयास किए थे। किंतु उनके मंसुबे पर पानी फिर गया था। जिस कारण से वे भूरिया जी के प्रति कुछ असंतोष रखते है किंतु खुल कर कुछ कह नहीं पाते है।
रोचक मुकाबले की संभावना।
लोकसभा चुनाव को लेकर रोचक मुकाबले की संभावनाएं है। एक ओर जहां कांग्रेस का प्रत्याशी घोषीत हो चुका है। वहीं भाजपा की ओर से भी चुनाव मैदान में गुमानसिंह डामोर के आने की पूरी संभावनाएं है। जिसे देखते हुए लग रहा है कि इस बार लोकसभा का चुनाव रोचक रहेगा। क्योंकि गुमान िसंह डामोर टीम मेनेजमेंट में माहिर है। उन्होंने मात्र 20 दिन की तैयारी में झाबुआ विधानसभा में कांतिलाल भूरिया के पुत्र विक्रांत भूरिया को शिकस्त दी है। वहीं विधानसभा चुनाव के बाद वे लोकसभा चुनाव की तैयारियों में लग गए है और पूरे लोकसभा क्षेत्र में आमजनों और कार्यकर्ताओं से सतत संपर्क में है। माना जा रहा है। इस बार गुमानसिंह डामोर का मुकाबला पिता से है। जो की उनके लिए इतना आसान नहीं होगा। इस मुकाबले में उंट किसी करवट बैठेगा। यह तो समय बताएगा।