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महाशिवरात्रि व्रत 14 फरवरी को प्रशस्त है

वाराणसी स्थित श्री काशीविश्वनाथ मंदिर

महाशिवरात्रि जन्माष्टमी आदि व्रत निशीथ व्यापिनी तिथ्याधारित होते हैं। निशीथ व्यापिनि का अर्थ सम्पूर्ण रात्रि में व्याप्त होना नहीं बल्कि रात्रि में व्याप्त होना है । मध्य रात्रि तक व्याप्त तिथि श्रेष्ठ निशीथ व्यापिनी मानी जाती है । महाशिवरात्रि व्रत फाल्गुन कृष्ण निशीथ व्यापिनी चतुर्दशी को प्रतिवर्ष मनाया जाता है।

इस वर्ष 13 फरवरी व 14 फरवरी दोनो दिन लगभग मध्य रात्रि को चतुर्दशी है यही भ्रम का कारण है। 13 फरवरी को रात्रि 10:34 के बाद से चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ है। जो 14 फरवरी को रात 12:46 तक रहेगी ।

व्रत त्यौहारादि में सबसे ज्यादा महत्व शुद्ध तिथि का होता है। शुद्ध तिथि के अभाव में ही अशुद्ध का ग्रहण विधेय है। तिथि वही शुद्ध है जो सूर्य परिष्कृत हो। अर्थात् जिस तिथि में सूर्य का उदय हुआ हो जिसे सामान्य भाषा में उदया तिथि के नाम से हमलोग जानते हैं ।

14 फरवरी वाली चतुर्दशी महाशिवरात्रि के लिए अनिवार्य शर्त निशिथ व्यापिनि को पूरा करते हुए(रात्रि 12:46 तक चतुर्दशी होने से) सूर्य परिष्कृत अर्थात् शुद्ध तिथि भी है अतः 14 फरवरी को ही शिवरात्री मनाना ज्यादा श्रेयस्कर होगा ।

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शास्त्रीय आधार

आठवें मुहूर्त तक व्याप्त तिथि निशीथ व्यापिनि कहलाती है । एक मुहूर्त 2 घटी का का होता है, इसलिए –

8 मुहुर्त =16घटी = 6 घंटा 24 मिनट

14 फरवरी को सूर्यास्त 17:58 बजे है अतः 17:58 + 6:24 = 24:22 मिनट पर रात्रि का आठवाँ मुहूर्त रहेगा । चूंकि उस रात्रि चतुर्दशी 24:46 तक है, तो निश्चित ही यह चतुर्दशी निशीथ व्यापिनी है ।

शिवरात्री प्रसंग में दो मत हैं-
1. निशिथ व्यापिनी
2. प्रदोष व्यापिनी

निर्णय सिन्धु में कामिक का प्रमाण प्रस्तुत करते हुए कमलाकर लिखते हैं-

आदित्यास्तमयेकाले अस्ति चेद्या चतुर्दशी।
तद्रात्रिः शिवरात्रिः स्यात्सा भवेदुत्तमोत्तमा।।

अन्य स्मृति का प्रमाण भी उन्होंने प्रस्तुत किया है-

प्रदोषव्यापिनी ग्राह्या शिवरात्री चतुर्दशी।

फिर कमलाकर लिखते हैं –

दिनद्वये निशिथ व्याप्तौ प्रदोषव्याप्त्या निर्णय:।

14 फरवरी को चतुर्दशी निशिथव्यापिनी और प्रदोषव्यापिनी दोनों ही मतों को पुष्ट करती है। इसके साथ-साथ वह शुद्ध चतुर्दशी गुण से भी युक्त है अतः 14 फरवरी ही मेरे मत से शिवरात्री के लिए प्रशस्त और ग्राह्य है।

अमायुक्त चतुर्दशी का जो निषेध स्कन्दपुराणादि में दिए गए हैं वो विरोधी मत न होकर समर्थित मत ही हैं बस समझने का फेर है।

 

डॉ अनिल तिवारी, प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुविद

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